पश्चिम बंगाल 2021 चुनाव- एक विश्लेषण

(लेखक- कुशाग्र पाण्डे एवं आलोक यादव, society for democratic political reforms (www.fdpr.in) के सह-संस्थापक हैं, और चुनावी सर्वे, विश्लेषण एवं शोधकार्य करते हैं)

 

पृष्ठभूमि (background)-

2016 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी ने 211 सीटों के साथ अपना बहुमत बरकरार रखा, कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट ने गठबंधन में लड़ते हुए क्रमश: 44 और 33 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी सिर्फ 3 सीटों पर कामयाब रही। लेकिन बीजेपी ने 2019 के चुनावों में अपने वोट शेयर को बढ़ाकर 40.64% कर लिया। बीजेपी के वोट शेयर में इस वृद्धि में वाम दलों के लगभग 13% और कांग्रेस से लगभग 7% वोट स्तानन्तरित होने के कारण संभव हुआ।

 

आगामी विधानसभा चुनावों में, लोकसभा चुनावों के विपरीत क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर नतीजे तय करने वाले प्रमुख कारक हैं: सीएम की लोकप्रियता, मौजूदा सरकार से संतोष/असंतोष (anti incumbency), पिछड़े समाजों की लामबंदी (subaltern mobilisation), पार्टी का जमीनी कैडर, लोकलुभावनवाद, महिला मतदाता, और लेफ्ट- कांग्रेस गठबंधन।

इस लिखे में संक्षिप्त में इन्हें समझने का प्रयास किया गया है।

 

राजनीतिक समाज (the party society)-

 राजनीतिक वैज्ञानिक पार्थ चटर्जी कहते हैं कि, पश्चिम बंगाल में प्रमुख शब्द ‘पार्टी’ है, “यह वास्तव में राज्य में ग्रामीण जीवन की प्राथमिक और महत्वपूर्ण संस्था है – न कि परिवार, न रिश्तेदारी, न जाति, न धर्म, न बाजार। यह एक ऐसी संस्था है जो हर सामाजिक पहलू में एक क्षेत्र  (कुछ अपवादों को छोड़कर) भरपूर दखल रखती है।

 

राजनीतिक दल ’न केवल राजनीतिक क्षेत्र बल्कि व्यक्तिगत परिदृश्य को भी निर्देशित और प्रभावित करती है। लेफ्ट के बनाई इस व्यवस्था पर टीएमसी आहिस्ता-आहिस्ता बाहुबल का उपयोग करते हुए काबिज़ हो गयी। बीजेपी टीएमसी के इसी पार्टी-समाज पर धार्मिक धार्मिक ध्रुवीकरण को माध्यम बनाकर हतियाना चाहती है। 2018 में राजनीतिक वैज्ञानिक सुधा पाई और सज्जन कुमार की पुस्तक “एवरीडे कम्युनलिज्म: (Everyday communalism: riots in contemporary Uttar Pradesh)” में वर्णित है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सफलता छोटे विवादों को सांप्रदायिक रंग देने की क्षमता पर आधारित थी, पश्चिम बंगाल में एक नया राजनीतिक प्रतिमान बनाने के लिए भाजपा इस रणनीति को बड़े स्तर पर आज़मा रही है, जहां दैनिक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण आमजन के सभी राजनीतिक सवालों का आधार दिखाया जा रहा है।

 

पहचान की राजनीति (identity politics)

ऐतिहासिक दृष्टि से बंगाल के राजनीतिक विभाजन को वर्ग द्वारा परिभाषित किया गया है। जैसे कि शहरी कुलीन (भद्रलोक) और मजदूर वर्ग, जमींदार और भूमिहीन, सीमांत मजदूर, छोटे किसान आदि, लेकिन पिछले एक दशक में यहाँ धीरे-धीरे पहचान की राजनीति ने अपनी जगह बना ली है और भाजपा इसके केंद्र में है।

 जाति एक ऐसा कारक है जिसे भारत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और ऐतिहासिक रूप से बंगाल के राजनीतिक दलों पर संभ्रांत वर्ग का दबदबा रहा है। राजबंशी (विधानसभाओं के लगभग आधे हिस्से में प्रभावशाली), बाउरी, बगदीस ऐसे कई समूह हैं जिन्हें भद्रलोक द्वारा लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया। जबकि महिषास (संख्या के आधार पर सबसे प्रमुख जाति) और समकक्ष जातिया निरंतर ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रही है। बीजेपी इनके पिछड़ेपन के लिए टीएमसी के अल्पसंख्यक तुष्टीकरण (जो कि आंकड़े नकारते हैं) को जिम्मेदार ठहराते हुए, उनकी आकांक्षाओं को हिंदुत्व के साथ जोड़ कर दिखा रही है।

टीएमसी हिंदुत्व को बंगाली अस्मिता और क्षेत्रीय पहचान से मुकाबला कर रही है। समाज सुधारक स्व० श्री ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ना, असम के NRC में बंगालियों के बाहर करना और भाजपा का अपने केंद्रीय नेतृत्व पर अति-निर्भरता ने बाहरी बनाम बंगाली की बहस को और हवा मिली है, और भाजपा को इससे नुकसान होना तय है। साथ ही ममता ने महिषास, तामुल, तिलिस और साहा जातियों के आरक्षण दिलाने के लिए एक विशेष कार्यबल स्थापित किया है, जिसका चुनाव में तृणमूल को लाभ मिलेगा। ममता ने पहाड़ी समुदायों के विकास के लिए कई परिषद बनाए हैं, जिससे स्तानीय लोग संतुष्ट भी है।  

ममता सरकार द्वारा आदिवासियों द्वारा बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं को मान्यता दी गई है और मातृभाषाओं में शिक्षा प्रदान करने के लिए स्कूलों की स्थापना की गई है। जैसे प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’ के माध्यम से मतदाताओं (औऱ भावी मतदाताओं) में अपनी साख बनाने का प्रयास कर रहे हैं, उसी प्रकार से ममता के ये प्रयास ज़्यादा प्रभावी साबित होंगे।

 

वर्तमान शासन के प्रति असंतोष (anti incumbency)-

ममता बनर्जी की छवि एक बेजोड़ जननेता की है जो वास्तव में लोगों की परवाह करता है और उनके प्रति कटिबद्ध भी है। जो सरकार के प्रति असंतोष (anti incumbency) दिखाई देती है वो ज्यादातर स्थानीय नेताओं और इकाइयों के इर्द-गिर्द तक ही सीमित है। इससे होने वाले संभावित नुकसान से मुकाबला करने के लिए, तृणमूल ने 114 नये चेहरों को टिकट दिए हैं, और पिछले 2 वर्षों में लगभग दो-तिहाई जिला अध्यक्षों को बदला है। जबकि, बीजेपी मुख्य रूप से टीएमसी के ही नहीं अपितु लेफ्ट और कांग्रेस के दलबदलुओं पर ही निर्भर है, जिसने भाजपा कार्यकर्ता में काफी रोष है। उम्मीदवारों की घोषणा से नाराज़ होकर भाजपा के कई नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। उत्तर बंगाल की तरह, बीजेपी के लिए भी गरीबों के टिकट वितरण ने पुष्ट जीत दर्ज की है।

 ममता का मूल्यांकन मतदाताओं द्वारा भाजपा और वाम-कांग्रेस गठबंधन के मुख्यमंत्री के चेहरे की तुलना में किया जाएगा। यह सर्वविदित है कि विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय समीकरणों का महत्व अधिक होता है, लेकिन विपक्ष के पास बनर्जी के करिश्मे का मुकाबला करने के लिए कोई नेता नहीं है। नंदीग्राम से अपनी ही पार्टी के बागी नेता शुवेन्दु अशिकारी के खिलाफ़ चुनाव लड़ने का उनका फैसला उनकी मजबूत नेता की छवि को और उभारता है।

 

प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद (competitive populism)-

बंगाल में, मोदी के व्यक्तित्व को ममता के ब्रांड से जूझना पड़ेगा। 2014 के बाद से कल्याणकारी योजनाओं के ढाँचे में उल्लेखनीय बदलाव आया है। अधिक केंद्रीकरण के कारण केंद्र सरकार निरंतर हर योजना का श्रेय खुद ले ले रही है। साख के श्रेय का केंद्रीकरण हुआ है जिसने कई अयोग्य सीएम को अपनी ही पार्टी से भी पीछे कर दिया है। इससे निपटने के लिए बंगाल सरकार राज्य स्तर पर अपनी कल्याणकारी योजनाये ​​चला रही है।

 ममता सरकार ने ‘कन्याश्री’ जैसी योजनाओं के साथ अपनी साख बनाई है, जो लड़कियों की भलाई और स्थिति को सुधारने का प्रयास करती हैं  ‘सबुज साथी’ जिसके तहत 9 वीं और 12 वीं कक्षा में पढ़ने वाले राज्य के सरकारी, राज्य प्रायोजित, सहायता प्राप्त स्कूलों और मदरसों के छात्रों को साइकिल दी जाती है, बच्चों के बीच में स्कूल छोड़ने को कम करने के लिए वैश्विक मान्यता प्राप्त कर चुकी है। राशन व्यवस्था (PDS) में निरंतर सुधार हुआ है जिससे तृणमूल को 2016 के चुनावों में भी फायदा हुआ था। पार्टी ने “डुअर सरकार” (सरकार द्वार पर) आउटरीच कार्यक्रम भी शुरू किया है, जिससे लोगों को 11 राज्य-संचालित कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उनकी चौखट पर ही मिलता है। ‘स्वास्थ्य साथी’ 

के तहत स्वास्थ्य कार्ड के लिए लोगों को लंबी कतारो से राहत मिली है। और ‘दीदी के बोलो’ हेल्पलाइन के लाखों फोन कॉल हमें बताते हैं कि ये योजनाएं कितनी लोकप्रिय हैं। 

इनके अलावा आर्थिक मापदंडों पर भी राज्य में  काफ़ी सुधार आया है। पश्चिम बंगाल में लघु एवं सूक्ष्म उद्योग (MSME) का देश में उच्चतम प्रतिशत है। इन सभी ने ममता के लोकप्रियता आधार को व्यापक बनाने में मदद की है और आगामी चुनाव में तृणमूल के प्रदर्शन को सुनिश्चित किया है।

 

 महिला मतदाता-

पिछले एक दशक में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अधिक से अधिक महिला मतदाता अपने स्वयं की इक्छानुसार मतदान कर रहीं हैं। ठीक वैसे ही जैसे हमने बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश के समर्थन में पाया था, बंगाल में महिला वोट ममता को तीसरा कार्यकाल दिलाने का एक महत्वपूर्ण कारक होगा।

पश्चिम बंगाल में 3.5 करोड़ महिला मतदाता हैं, जो कि कुल मतदाताओं का 49% है। 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान टीएमसी ने 17 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था और अन्य सीटों पर मिले 43% औसत वोट शेयर की तुलना में महिला उम्मीदवारों वाली सीटों पर 48% महिलाओं के वोट मिले थे। पिछले दो विधानसभा चुनावों में टीएमसी की सफलता के लिए महिलाओं का समर्थन महत्वपूर्ण रहा है। मौजूदा विधानसभा चुनावों में टीएमसी ने 50 महिला उम्मीदवार उतारे हैं। ममता की ज्यादातर रैलियों में बड़ी संख्या में महिलाएं होती हैं, तृणमूल ने इस पहलू को समझकर महिलाओं को ध्यान में रखते हुए प्रचार-प्रसार और चुनावी कैंपेन तैयार किया है। लेकिन तृणमूल की पहुच केवल भाषणों और रैलियों तक सीमित नहीं है, पिछले 10 वर्षों के दौरान सरकार ने विशेष रूप से अपनी कल्याणकारी नीतियों के माध्यम से महिलाओं को लक्षित किया है। 

तृणमूल कांग्रेस में महिला कार्यकर्ता और पदाधिकारियों का प्रतिशत भी बहुत अच्छा है, अतः महिलाओं में बेहतर घुसपैठ बनाये रखने में सक्षम है। आशा कार्यकता अपने जीवन मे भी सुधार महसूस करती हैं और उनकी सेवाओं से ग्रामीण अंचल की महिलाये भी सन्तुष्ट पाई गयीं, अतः लाभ ममता को मिलेगा।

2017 में हेग में संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा पुरस्कार जीतने वाली ‘कन्याश्री’ योजना सबसे सफल रही। रूपश्री और स्वस्ति सती जैसी योजनाओं ने महिलाओं को आगे लाने में बड़ा योगदान दिया है। सार्वजनिक सभाओं में बोलते समय, कई टीएमसी नेता भाजपा पर एक महिला विरोधी पार्टी के रूप में हमला करते हैं और उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश एवं अन्य भाजपा शासित राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को उजागर करते हैं। 

भाजपा में महिला नेताओ की कमी है, जो मुख्यतः महिला मतदाताओं से जुड़ने के लिए अपने नए संगठन पर टिकी है। पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी महत्वपूर्ण संख्या में महिला मतदाताओं को आकर्षित करने में सक्षम थी, लेकिन यह एक विधानसभा चुनाव था जहां क्षेत्रीय मुद्दे और आकांक्षाएं अधिक महत्वपूर्ण होते हैं, यह उम्मीद की जाती है कि ममता उन महिला मतदाताओं को वापस लाने में सक्षम रहेंगीं जो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ गईं थी।

 

संवर्ग (cadre)-

भाजपा उम्मीद कर रही है कि बंगाल के इतिहास में पहली मतदाता पार्टी कैडर को दरकिनार करके मतदान करेगा। भाजपा ने अपना जनाधार मजबूत करने के लिए दलबदल की रणनीति अपनाई है। दलबदलुओं या बागियों पर निर्भरता के साथ यह स्पष्ट है कि भाजपा बंगाल में एक बहुत कमजोर संगठन है और ये चुनाव उनकी तैयारी के हिसाब से बहुत जल्द आ गए हैं। बिहार जैसे राज्यों में जहां भजपा ने दशकों में अपना आधार बनाया है, बंगाल में अभी उन्हें समय लगेगा।

भाजपा यकीनन जमीन पर कमज़ोर है और कैडर की कमी के कारण सत्ता विरोधी लहर को पकड़ने के लिए संघर्ष कर रही है। करीबी ताने-बाने में बुने हुये समाज में बाहुबल धनबल से अधिक महत्व रखेगा, ये पहलू भी तृणमूल के पक्ष में रहेगा।

 

लेफ्ट कांग्रेस गठबंधन-

2019 लोकसभा चुनाव में वाम कांग्रेस गठबंधन को केवल 13% वोट और दो सीटें मिलीं। ISF (भारतीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चा) के साथ हाथ मिलाकर वे कुछ खोए हुए मैदान को हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें मुस्लिम समुदाय के समर्थन को वापस जीतने की कोशिश प्रमुख है, जो 2007 से धीरे-धीरे तृणमूल के साथ हो चुका है।

 CPI (M) वास्तव में कड़ी मेहनत कर रहा है, साथ ही भाजपा ने कई टीएमसी दलबदलुओं को मैदान में उतारा है, अतः पूर्व में लेफ्ट के ‘प्रतिबद्ध’ मतदाता बीजेपी के पाले से लौट सकते हैं। 

2016 विधानसभा चुनाव में मिले समर्थन की से बहुत सीमित सुधार की ही उम्मीद है, अतः चुनाव भाजपा एवं तृणमूल के बीच द्विध्रुवीय बने रहने चाहिए।

 

अल्पसंख्यक मत-

भारत में मुस्लिम सांसदों की संख्या में 1990 में 14% से 2014 में 9% की गिरावट आई है, जबकि 2014 और 2019 दोनों में भाजपा के पास एक भी सांसद नहीं है। इसने उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को पर्याप्त मुस्लिम आबादी के साथ मैदान में नहीं उतारा। बंगाल में लगभग 20% ब्लॉकों में 50% से अधिक मुस्लिम आबादी है, जिससे अन्य राज्यों की तरह मुस्लिम वोटों की अनदेखी करना मुश्किल है। बीजेपी ने खुद 9 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है और अब्बास सिद्दीकी की आईएसएफ पर टीएमसी के वोटों में कटौती करने के लिए बैंकिंग की है। 

लेकिन, जैसा कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में हुआ था, अल्पसंख्यक भाजपा को हराने के लिये (कांग्रेस को हारा हुआ मानकर) एक-तरफा आम आदमी पार्टी के साथ चले गये, क्योंकि यह उनके अस्तित्व की लडाई बन गयी थी। बंगाल में भी अल्पसंख्यक समुदाय पूर्णतः टीएमसी के पक्ष में जाता दिख रहा है।

 

निष्कर्ष:

उपरोक्त पहलुओं के अलावा, नवम्बर 2016 में की गयी नोटबन्दी, जीएसटी का ठीक क्रियान्वयन ना होना, अनियोजित लॉकडाउन और उच्च ईंधन की कीमतों के कारण बढ़ रहे आर्थिक संकट निश्चित रूप से बीजेपी के खिलाफ जाएंगे।

इसके अलावा, चल रहे किसानों के विरोध का असर ग्रामीण आबादी पर पड़ना तय है, खासकर की जब पंजाब-हरयाणा से पहुँचे 200-300 गाड़ियों का दल गली-गली घूमकर भाजपा के खिलाफ प्रचार कर रहा है।

और चुनाव के सप्ताह भर पूर्व बीजेपी के उम्मीदवारों का टिकट वापस करने को स्थानीय लोग प्रत्याशियों द्वारा भाजपा की सरकार ने बन पाने की सूरत में प्रतिशोध से बचने का प्रयास मान रहे हैं।

अतः ममता बनर्जी की वापसी पक्की है, और वह भी धमाके के साथ।

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